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भारतीय संस्कृति के सभी धर्मों में सभी पर्व खास देवी-देवताओं से जुड़े हुए हैं। व्रत त्योहार व पर्व पूर्ण भक्तिभाव के साथ मनाने की परम्परा है। भाद्रपद शुक्लपक्ष की चतुर्दशी तिथि के दिन मनाया जाता है। इस पर्व पर क्षीरसागर में शेषनाग की शैया पर शयन करने वाले भगवान् श्रीविष्णु जी की विधि-विधानपूर्वक पूजा-अर्चना की जाती है। ज्योतिषविद् विमल जैन ने बताया कि भाद्रपद शुक्लपक्ष की चतुर्दशी तिथि 19 सितम्बर, रविवार को सम्पूर्ण दिन रहेगी। जिसके फलस्वरूप अनन्त चतुर्दशी का व्रत 19 सितम्बर, रविवार को रखा जाएगा।
महत्व और मुहूर्त
भाद्रपद शुक्लपक्ष की चतुर्दशी तिथि 19 सितम्बर, रविवार को प्रात: 6 बजकर 00 मिनट पर लगेगी जो 19 सितम्बर, रविवार को अद्र्धरात्रि के पश्ïचातï् 5 बजकर 29 मिनट तक रहेगी। अनन्त चतुर्दशी के व्रत से व्यक्ति को अपने जीवन में भगवान् श्रीविष्णु जी के आशीर्वाद से जीवन में सुख-समृद्धि का सुयोग बना रहता है, साथ ही व्यक्ति का जीवन धन-धान्य से परिपूर्ण रहता है। अनन्त चतुर्दशी के व्रत को 14 वर्ष तक नियमपूर्वक करने पर जीवन के समस्त दोषों का शमन होता है तथा सुख-समृद्धि में अभिवृद्धि होती रहती है।
ऐसे करें व्रत व पूजा
प्रात:काल ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान-ध्यान के पश्चात् अपने आराध्य देवी-देवता की पूजा के उपरान्त अनन्त चतुर्दशी के व्रत का संकल्प लेना चाहिए। व्रत के दिन भगवान् श्रीविष्णुजी की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। इस दिन कच्चे सूत के धागे को 14 गाँठ लगाकर उसे हल्दी से रंगने के पश्चात् विधि-विधानपूर्वक अक्षत, धूप-दीप, नैवेद्य, पुष्प आदि से पूजा करनी चाहिए। इस सूत्र को अनन्त सूत्र भी कहा जाता है। इस सूत्र को पुरुष दाहिने हाथ में तथा महिलाएँ बाएँ हाथ की भुजा में धारण करती हैं।
व्रतकर्ता के लिए विशेष
व्रतकर्ता को दिन में शयन नहीं करना चाहिए। व्यर्थ की वार्तालाप से बचना चाहिए। अपने जीवनचर्या में शुचिता बरतनी चाहिए। अनन्त सूत्र को 14 दिन तक धारण करने के पश्चात् 15वें दिन गंगाजी, नदी अथवा स्वच्छ जल में प्रवाहित कर देना चाहिए। अपनी परम्परा व रीति-रिवाज के अनुसार अनन्त सूत्र (धागे) को वर्षपर्यन्त अगले अनन्त चतुर्दशी तक धारण करने का भी विधान है। व्रत के दिन नमक ग्रहण करना वॢजत है। एक ही अन्न से नमक रहित भोज्य सामग्री या फलाहार ग्रहण किया जाता है। व्रत के दिन अनन्त चतुर्दशी के कथा का पठन व श्रवण भी किया जाता है। इस दिन ब्राह्मण को यथासमर्थ अन्न व नकद द्रव्य आदि दान करने के उपरान्त उनसे आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए, जिससे जीवन में सुख-समृद्धि खुशहाली बने रहे।

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