आइये , जानते है पुरी जानकारी नारायणबलि और नागबलि श्राद्ध

इनोवेस्ट पित्र पक्ष विशेष ( 21 – 6 oct )

क्या बेटियां कर सकती हैं श्राद्ध …

पितृ पक्ष – जानिए पूरी जानकारी , 21 सितम्बर, मंगलवार से, 6 अक्टूबर, बुधवार को समापन ,

श्राद्ध के फायदे और कितने प्रकार के होते ये कर्म

पितृ खुश तो इंसान राजा और नाखुश तो भिखारी



प्रस्तुत लेख में ‘नारायणबली, नागबलि श्राद्ध’ के विधियों के संदर्भ में महत्त्वपूर्ण सूचनाएं, विधि का उद्देश्य, योग्य काल, योग्य स्थान, विधि करने की पद्धति एवं विधि करने से हुई अनुभूतियों का समावेश है ।

नारायणबलि और नागबलि श्राद्ध से संबंधित महत्त्वपूर्ण सूचनाएं

शास्त्र : ये अनुष्ठान अपने पितरों को (उच्च लोकों में जाने हेतु) गति मिले, इस उद्देश्य से किए जाते हैं । शास्त्र कहता है कि उसके लिए ‘प्रत्येक व्यक्ति अपनी वार्षिक आय का 1/10 (एक दशांश) व्यय करे’ । यथाशक्ति भी व्यय किया जा सकता है ।

ये अनुष्ठान कौन कर सकता है ?
ये काम्य अनुष्ठान हैं । यह कोई भी कर सकता है । जिसके माता-पिता जीवित हैं, वह भी कर सकते हैं । अविवाहित भी अकेले यह अनुष्ठान कर सकते हैं । विवाहित होने पर पति-पत्नी बैठकर यह अनुष्ठान करें ।

निषेध : स्रियों के लिए माहवारी की अवधि में ये अनुष्ठान करना वर्जित है । स्त्री गर्भावस्था में 5वें मास के पश्चात यह अनुष्ठान न करे । घर में विवाह, यज्ञोपवीत इत्यादि शुभ कार्य हो अथवा घर में किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाए, तो यह अनुष्ठान एक वर्ष तक न करें ।

पद्धति : अनुष्ठान करने हेतु पुरुषों के लिए धोती, उपरना, बनियान तथा महिलाओं के लिए साडी, चोली तथा घाघरा इत्यादि नए वस्त्र (काला अथवा हरा रंग न हो) लगते हैं । ये नए वस्त्र पहनकर अनुष्ठान करना पडता है । तत्पश्चात ये वस्त्र दान करने पडते हैं । तीसरे दिन सोने के नाग की (सवा ग्राम की) एक प्रतिमा की पूजा कर दान किया जाता है ।

अनुष्ठान में लगनेवाली अवधि : उपरोक्त तीनों अनुष्ठान पृथक-पृथक हैं । नारायण-नागबलि अनुष्ठान तीन दिनों का होता है तथा त्रिपिंडी श्राद्ध अनुष्ठान एक दिन का होता है । उपरोक्त तीनों अनुष्ठान करने हों, तो तीन दिन में संभव है । स्वतंत्र रूप से एक दिन का अनुष्ठान करना हो, तो वैसा भी हो सकता है ।

क्या है नारायणबलि

उद्देश्य : ‘दुर्घटना में मृत अथवा आत्महत्या किए हुए मनुष्य का क्रिया कर्म न होने से उसका लिंगदेह (सूक्ष्म शरीर) प्रेत बनकर भटकता रहता है और कुल में संतान की उत्पत्ति नहीं होने देता । उसी प्रकार, वंशजों को अनेक प्रकार के कष्ट देता है । ऐसे लिंगदेहों को प्रेतयोनि से मुक्त कराने के लिए नारायण बलि करनी पडती है ।

अनुष्ठान (विधि)
अनुष्ठान करने का उचित समय: नारायण बलि का अनुष्ठान करने के लिए किसी भी मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तथा द्वादशी उचित होती है । एकादशी को अधिवास (देवता की स्थापना) कर द्वादशी को श्राद्ध करें । (वर्तमान में अधिकतर लोग एक ही दिन अनुष्ठान करते हैं ।) संतति की प्राप्ति हेतु यह अनुष्ठान करना हो, तो उस दंपति को स्वयं यह अनुष्ठान करना चाहिए । यह अनुष्ठान श्रवण नक्षत्र, पंचमी अथवा पुत्रदा एकादशी में से किसी एक तिथि पर करने से अधिक लाभ होता है ।

अनुष्ठान करने के लिए उचित स्थान : नदी तीर जैसे पवित्र स्थान पर यह अनुष्ठान करें ।

पद्धति

पहला दिन : प्रथम तीर्थ में स्नान कर नारायणबलि संकल्प करें । दो कलशों पर श्री विष्णु एवं वैवस्वत यम की स्वर्ण प्रतिमा स्थापित कर उनकी षोडशोपचार पद्धति से पूजा करें । तत्पश्चात, उन कलशों की पूर्व दिशा में दर्भ (कुश) से एक रेखा खींचकर उस पर कुश को उत्तर-दक्षिण बिछा दें और ‘शुन्धन्तां विष्णुरूपी प्रेतः’ यह मंत्र पढकर दस बार जल छोडें ।

तत्त्पश्चात दक्षिण दिशा में मुख कर अपसव्य (यज्ञोपवीत दाहिने कँधे पर) होकर विष्णुरूपी प्रेत का ध्यान करें । उन फैलाए हुए कुशों पर मधु, घी तथा तिल से युक्त दस पिंड ‘काश्यपगोत्र अमुकप्रेत विष्णुदैवत अयं ते पिण्डः’ कहते हुए दें । पिंडों की गंधादि से पूजा कर, उन्हें नदी अथवा जलाशय में प्रवाहित कर दें । यहां पहले दिन का अनुष्ठान पूरा हुआ ।

दूसरा दिन : मध्याह्न में श्रीविष्णु की पूजा करें । पश्चात 1, 3 अथवा 5 ऐसी विषम संख्या में ब्राह्मणों को निमंत्रित कर एकोद्दिष्ट विधि से उस विष्णु रूपी प्रेत का श्राद्ध करें । यह श्राद्ध ब्राह्मणों के पाद प्रक्षालन से आरंभ कर तृप्ति-प्रश्न (हे ब्राह्मणों, आप लोग तृप्त हुए क्या ?, ऐसे पूछना) तक मंत्र रहित करें । श्री विष्णु, ब्रह्मा, शिव एवं सपरिवार यम को नाम मंत्रों से चार पिंड दें । विष्णु रूपी प्रेत के लिए पांचवां पिंड दें । पिंड पूजा कर उन्हें प्रवाहित करने के पश्चात ब्राह्मणों को दक्षिणा दें । एक ब्राह्मण को वस्त्रालंकार, गाय एवं स्वर्ण दें । तत्पश्चात प्रेत को तिलांजलि देने हेतु ब्राह्मणों से प्रार्थना करें । ब्राह्मण कुश, तिल तथा तुलसी पत्रों से युक्त जल अंजुलि में लेकर वह जल प्रेत को दें । पश्चात श्राद्ध कर्ता स्नान कर भोजन करे । धर्मशास्त्रों में लिखा है कि इस अनुष्ठान से प्रेतात्मा को स्वर्ग की प्राप्ति होती है ।

स्मृतिग्रंथों के अनुसार नारायणबलि एवं नागबलि एक ही कामना की पूर्ति करते हैं, इसलिए दोनों अनुष्ठान साथ-साथ करने की प्रथा है । इसी कारण इस अनुष्ठान का संयुक्त नाम ‘नारायण-नागबलि’ पडा ।

नागबलि

उद्देश्य : पहले के किसी वंशज से नाग की हत्या हुई हो, तो उस नाग को गति न मिलने से वह वंश में संतति के जन्म को प्रतिबंधित करता है । वह किसी अन्य प्रकार से भी वंशजों को कष्ट देता है । इस दोष के निवारणार्थ यह अनुष्ठान किया जाता है ।

अनुष्ठान (विधि) : संतति की प्राप्ति के लिए यह अनुष्ठान करना हो, तो उस दंपति को अपने हाथों से ही यह अनुष्ठान करना चाहिए । अनुष्ठान पुत्र प्राप्ति के लिए करना हो, तो श्रवण नक्षत्र, पंचमी अथवा पुत्रदा एकादशी, इनमें से किसी एक तिथि पर करने से अधिक लाभ होता है ।’

नारायण-नागबालि विधि करते समय हुई अनुभूतियां : नारायण-नागबलि अनुष्ठान करते समय वास्तविक प्रेत पर अभिषेक करने का दृश्य दिखाई देना तथा कर्पूर लगाने पर प्रेत से प्राणज्योति बाहर निकलती दिखाई देना

अनुभव – ‘नारायण-नागबलि अनुष्ठान में नारायण की प्रतिमा की पूजा करते समय मुझे लगा कि ‘इस अनुष्ठान से वास्तव में पूर्वजों को गति मिलने वाली है ।’ उसी प्रकार, आटे की प्रेत प्रतिमा पर अभिषेक करते समय लग रहा था जैसे मैं वास्तविक प्रेत पर ही अनुष्ठान कर रहा हूं । अंत में प्रतिमा की छाती पर कर्पूर लगाने पर प्रेत से प्राण ज्योति बाहर जाती दिखाई दी और मेरे शरीर पर रोमांच उभरा । तब मुझे निरंतर परात्पर गुरु जयंत बाळाजी आठवलेजी का स्मरण हो रहा था ।’

आगामी मंगलवार को पढ़िए , क्या है त्रिपिंडी श्राद्ध



बड़ी खबरें …

चुनावी अखाड़ा – काशी के सरजमीं से नौ अक्तूबर को फुकेगी प्रियंका गांधी शक्ति का बिगुल

परिवारिक विवाद में वकील ने खाया कचहरी में विषाक्त पदार्थ

वीडियो-कोर्ट परिसर में बदमाशों ने चलाई ताबड़तोड़ गोलियां,3 की मौत



पूर्व विधायक ललितेश पति त्रिपाठी ने कांग्रेस से की तौवा

बिजली बिल एक अक्टूबर से हिंदी में ,विधान परिषद में दर्ज कराई गयी थी आपत्ति

देखिये कैसे निकली लाट भैरव की बारात, कितना था उमंग


जानिए गोलगप्पों के अलग अलग नाम को, खाइये 10 रुपये के पांच पानीपुरी, बतासा

स्वाद का पारम्परिक जायका गुड़ की जलेबी, जानिए खास बातें

पलंगतोड़ मिठाई का नाम सूना क्या ….. देखिये कैसे बनता हैं …..



पितृ पक्ष – जानिए पूरी जानकारी , 21 सितम्बर, मंगलवार से, 6 अक्टूबर, बुधवार को समापन ,

जानिए , किस राजा ने शुरू किया था सोरहिया व्रत

जानिए क्या है सोलह श्रृंगार , क्या हैं इसके मायने


good news – काम की बातें –

राष्ट्रीय वयोश्री योजनान्तर्गत पंजीकरण, कल शुक्रवार को प्रातः 10:00 बजे से हनुमान प्रसाद पोद्दार अंध विद्यालय दुर्गाकुंड में


Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!