चुनावी बिगुल के बाद राजनैतिक दलों में बढ़ी मौसम वैज्ञानिको की संख्या

चुनावी बिगुल के बाद राजनैतिक दलों में बढ़ी मौसम वैज्ञानिको की संख्या


विनोद तिवारी

जैसे ही चुनाव आयोग ने पांच राज्यों के विधान सभा चुनाव की तारीख का एलान किया है सत्ता की लड़ाई में शामिल सभी राजनैतिक पार्टियों में हलचल तेज हो गई है।बदलते समीकरण एवम व्यक्तिगत महत्वकांक्षा पूरी ना हो पाने के कारण क्षुब्ध कई मौसम वैज्ञानिक प्रकार के नेताओ का दल बदल होना भी स्वाभाविक रूप से रफ्तार पकड़ चुका है। इस क्रम में आज का दिन देश व प्रदेश की सत्ता पर काबिज भाजपा के लिए झटका भरा रहा जहा पिछड़ों के कद्दावर नेता स्वामी प्रसाद मौर्य समेत कई बीजेपी विधायकों ने आज पार्टी से इस्तीफा दे दिया।हालांकि चुनावी मौसम में घटने वाली यह एक साधारण घटना है जिसका शायद ही कोई दूरगामी परिणाम होता है मगर पक्ष और विपक्ष को इन चीजों से एक दूसरे पर प्रहार करने का मौका मिल जाता हैं।जिसके बाद पार्टी कार्यकर्ता अपने अपने पार्टी की वाहवाही के साथ विपक्ष पर आक्रामक हो जाते है मगर सोचिए इन सब के बीच ठगा कौन जा रहा वही पार्टी का आम कार्यकता जो ना जाने अपने क्षेत्र के नेतृत्व करने की लालसा लिए कितने बार लाठी डंडा खाया होगा।एक झटके में उसके सपनो का महल रेत जैसे मुट्ठी से फिसल जायेगा फिर यही उत्साहित कार्यकर्ता अपने पार्टी से बगावत करेगा या फिर किसी हवाई मेहमान की बुझी हुई मन से अगुवाई करेगा।अगर इन सभी परिस्थितियों पर गौर किया जाए तो नुकसान सिर्फ और सिर्फ अपने पार्टी के लिए जान देने वाले कार्यकर्ता का होता है ।पार्टी मुखिया की तो हर हाल में चांदी रहती है अगर पार्टी बहुमत में आती है तो कुर्सी पर तो उसे ही बैठना है।इसलिए कार्यकर्ताओं के लिए यह समय उत्साहित होकर खुशी मानने के लिए नही बल्कि समझदारी से ये सोचने के लिए है की उनकी वर्तमान स्थिति क्या है?इस बीच अगर हम यूपी के वाराणसी जिले की बात करे जो प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र होने के कारण काफी सुर्खियों में है।पीएम का संसदीय क्षेत्र होने के कारण बीजेपी के लिए जहां यह नाक का सवाल है तो वही विपक्ष के लिए एक संकल्प है विपक्ष जानती है की यही वह सीट है जहां से पीएम के ग्लैमर की हवा निकाली जा सकती है लिहाजा सभी राजनैतिक पार्टियों द्वारा साम दाम दण्ड भेद सभी तरीके अपनाए जा रहे है।आपको बताते चले कि प्रधानमंत्री मोदी के जादू के कारण 2017 के चुनाव में सभी समीकरण को ध्वस्त करते हुए भाजपा ने जनपद के आठों सीट पर कब्जा किया था।अब 2022 के चुनाव में मोदी मैजिक क्या असर डालती है यह अभी भविष्य के गर्भ में है मगर एक बात तो तय है की वर्तमान में जिले के आठों सीट को सुशोभित किए हुए जनप्रतिनिधियों को वाराणसी की जनता बहुत पसंद नही कर रही है इसके बहुत सारे कारण हो सकते है जिनमे कोराेना काल के दौरान आम जन को अपेक्षित सहयोग न मिल पाना प्रमुख है।आगे पार्टी प्रत्याशियों की घोषणा होने के बाद ही कुछ कह पाना मुनासिब होगा की यह चुनावी ऊंट किस करवट बैठेगा।



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