भागीदारी परिवर्तन मोर्चा की पैंतरेबाजी से सपा-बसपा को झटका

भागीदारी परिवर्तन मोर्चा की पैंतरेबाजी से सपा-बसपा को झटका


– मतों के बिखराव का बीजेपी को मिलेगा फायदा
– अल्प संख्यक, अन्य पिछड़ा वर्ग, दलित और अति दलित पर सियासत

वरिष्ठ पत्रकार अजय कुमार तिवारी

लखनऊ। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के समीकरण में अपनी जीत के साथ दूसरों की टकराहट को तलाशा जा रहा है। एक ही वर्ग, जाति विशेष के मतों, प्रत्याशियों के बीच से जीत का रास्ता तलाशने का उपक्रम तेज हो गया है। भाजपा में भगदड़, सपा में स्वागत, कांग्रेस और बसपा छोड़ कर नये ठिकाने की तलाश। ये सब सियासी घोसले बदलने जैसा है। इसमें प्रत्याशी जाति, धर्म और क्षेत्र विशेष के अनुसार पाला बदल रहा है। इस बीच भागीदारी परिवर्तन मोर्चा की घोषणा से मतों के विभाजन के साथ नई पैंतरेबाजी शुरू हो गयी है। भागीदारी परिवर्तन मोर्चा में असदुद्दीन ओवैसी, बाबू सिंह कुशवाहा और वामन मेश्राम शामिल हैं। असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम, बाबूसिंह कुशवाहा की जन अधिकार पार्टी तथा वामन मेश्राम की पार्टी बैकवर्ड एंड माइनॉरिटी कम्युनिटीज एंप्लाई फेडरेशन शामिल हैं। भागीदारी परिवर्तन मोर्चा के गठन से यह साफ हो गया है कि तीनों दल अपने वोटबैंक को बचाने की कोशिश करंेगे। मुस्लिम, अन्य पिछड़ा वर्ग, दलित, अति दलित मतदाताओं पर इन तीनों दलों की नजर है।
मुस्लिम, अन्य पिछड़ा वर्ग, दलित, अति दलित वोट बैंक का एक हिस्सा जहां सपा की झोली में जाता हुआ दिख रहा है, वहीं बहुजन समाज पार्टी भी इस पर नजर गड़ाये हुए है। ऐसे में मुस्लिम, अन्य पिछड़ा वर्ग, दलित, अति दलित क्षेत्र विशेष, विधानसभा के अनुसार सपा-बसपा में बंट जाएगा। जहां सपा का प्रत्याशी मजबूत होगा, वहां सपा फायदे में रहेगी। बसपा मतदाताओं के लिए दूसरा विकल्प होगा। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बसपा के साथ यह समीकरण तेजी से काम करेगा। ज्ञात हो कि जिस विधानसभा में मतदाताओं के बीच अनिर्णय, उहापोह कि स्थिति रहेगी, वहां मतों का तेजी से विभाजन होगा। मुस्लिम, अन्य पिछड़ा वर्ग, दलित, अति दलित मतदाता सपा- बसपा के साथ तीसरे विकल्प को भी अपनायेेगा। असदुद्दीन ओवैसी ने तीसरे मोर्च के रूप में ही आह्वान किया है।
सपा-बसपा के साथ कांग्रेस की भी उपस्थिति है। लड़की हूं, लड़ सकती हूं के नारे के साथ महिलाओं के साथ अपने पारंपरिक मतदाताओं पर डोरे डाल रही है। वर्तमान में मतों का विभाजन और उम्मीदवारों की घोषणा पर्दे की पीछे की सियासी चाल को दिखा रहा है। भारतीय जनता पार्टी का थिंक टैंक मतों का विभाजन कराने में सफल हो गया है। भारतीय जनता पार्टी जहां अपने मतदाता को बचाने लगी है तो दूसरी दलों के मतों के बिखराव को भी देख रही है। दलित, अति दलित, पिछड़ा वर्ग, अति पिछड़ा वर्ग अपने सियासी दलों के लिए चुनावी फसल बन चुका है।

बसपा की सोशल इंजीनियरिंग
ज्ञात हो कि बहुजन समाज पार्टी सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला भी अपना रही है। इसके तहत दलितों के साथ ही ब्राह्मण, मुस्लिम, ओबीसी वोट बैंक पर खास ध्यान दिया जा रहा है। वर्ष 2007 में सोशल इंजीनियरिंग के फार्मूले से बसपा 206 सीटें जीती थी।

अखिलेश का समाजवादी फार्मूला
समाजवादी पार्टी ने 2012 विधानसभा चुनाव में 224 सीटें जीती थीं। बहुमत के लिए 202 का आंकड़ा पार करना था। 2012 चुनाव में अखिलेश ने भी मुस्लिम-यादव समीकरण के साथ ही अति पिछड़ा, अति दलित के साथ सवर्ण वर्ग को भी अपने साथ जोड़ा था।



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