
– पितृपक्ष 11 सितम्बर, रविवार से प्रारम्भ होकर 25 सितम्बर, रविवार को होगा समापन
हिन्दू धर्म के अनुसार पौराणिक मान्यता के मुताबिक पूर्वजों की स्मृति में प्रत्येक वर्ष पितृपक्ष में श्राद्ध करने की परम्परा है। ऐसी मान्यता है कि पितरों के आर्शीवाद से जीवन में आरोग्य, सौभाग्य, वैभव एवं ऐश्वर्य बना रहता है। पितरों को याद करके उनकी पुण्यतिथि पर उनकी प्रसन्नता के लिए श्रद्धा के साथ श्राद्धकृत्य करना उत्तम फलदायी रहता है, जिससे जीवन में खुशहाली बनी रहती है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित विश्व पंचांग के अनुसार इस बार 10 सितम्बर, शनिवार को प्रौष्ठपदी (पूर्णिमा) श्राद्ध तथा पितृपक्ष 11 सितम्बर, रविवार से प्रारम्भ होकर 25 सितम्बर, रविवार को समापन होगा।
तिथि के अनुसार श्राद्ध का फल
पितृपक्ष में तिथियों के अनुसार श्राद्ध करने की विशेष महिमा है। पितरों की पूजा-अर्चना का विशिष्ट माह आश्विन कृष्ण पक्ष निश्चित है। इस माह के कृष्ण पक्ष में श्रद्धा के साथ परदादा-परदादी, दादा-दादी, पिता-माता एवं अन्य सगे परिजनों को याद करके उनके निमित्त श्राद्ध करने से पितृगण प्रसन्न होकर अपना आर्शीवाद प्रदान करते हैं, जिससे जीवन में खुशहाली का सुयोग बनता है। प्रख्यात् ज्यातिषविद् विमल जैन ने बताया कि शास्त्रों के मुताबिक हर तिथि के श्राद्ध का अपना विशेष महत्व है। पौराणिक धार्मिक मान्यता के अनुसार पूर्णिमा तिथि एवं प्रतिपदा तिथि से अमावस्या तिथि तक विशेष श्राद्ध करने का अलग-अलग फल बताया गया है। इस क्रम में—
प्रौष्ठपदी श्राद्ध— 10 सितम्बर, शनिवार
प्रतिपदा का श्राद्ध— 11 सितम्बर, रविवार सुख-शान्ति की प्राप्ति।
द्वितीया का श्राद्ध— 12 सितम्बर, सोमवार धनसम्पत्ति व ऐश्वर्य का योग। ऐश्वर्य की प्राप्ति।
तृतीया का श्राद्ध— 13 सितम्बर, मंगलवार शत्रुओं से मुक्ति, सुख-समृद्धि।
चतुर्थी का श्राद्ध— 14 सितम्बर, बुधवार अभीष्ट एवं धन-सम्पत्ति-वैभव प्राप्ति का योग।
पंचमी का श्राद्ध— 15 सितम्बर, गुरुवार इस दिन अविवाहित व्यक्ति का श्राद्ध करना चाहिए।
षष्ठी का श्राद्ध— 16 सितम्बर, शुक्रवार देवी-देवताओं के आर्शीवाद से मिलती है खुशहाली।
सप्तमी का श्राद्ध— 17 सितम्बर, शनिवार यज्ञ के समान पुण्यफल का योग।
अष्टमी का श्राद्ध— 18 सितम्बर, रविवार सुख-समृद्धि की प्राप्ति।
नवमी का श्राद्ध— 19 सितम्बर, सोमवार मातृनवमी, सुपत्नी की प्राप्ति। सौभाग्यवती (सुहागिन) का श्राद्ध किया जाता है।
दशमी का श्राद्ध— 20 सितम्बर, मंगलवार लक्ष्मी की प्राप्ति।
एकादशी का श्राद्ध— 21 सितम्बर, बुधवार भगवान् विष्णु का सानिध्य, वेद-पुराण के ज्ञानार्जन। वैष्णव संन्यासी का श्राद्ध किया जाता है।
द्वादशी का श्राद्ध— 22 सितम्बर, गुरुवार प्रचुर अन्न-धन की प्राप्ति। इस दिन समस्त संन्यासियों का श्राद्ध किया जाता है।
त्रयोदशी का श्राद्ध- 23 सितम्बर, शुक्रवार दीर्घायु व प्रज्ञा प्राप्त। बालकों का श्राद्ध इस दिन किया जाता है।
चर्तुदशी का श्राद्ध- 24 सितम्बर, शनिवार दीर्घायु, शत्रुओं से रक्षा। जिन्होंने आत्महत्या की हो या जिनकी मृत्यु किसी शस्त्र से, दुर्घटना में अथवा विषपान से हुई हो।
अमावस्या का श्राद्ध— 25 सितम्बर, रविवार सर्वमनोरथ पूर्ण।
(अज्ञात तिथि वालों का)
स्नान-दान एवं श्राद्ध की अमावस्या 25 सितम्बर, रविवार को रहेगी।
आश्विन मास के कृष्णपक्ष की अमावस्या तिथि के दिन महालया का विसर्जन किया जाता है। इस बार 25 सितम्बर, रविवार को महालया सम्बन्धित समस्त धार्मिक अनुष्ठन विधि-विधानपूर्वक सम्पन्न होंगे। आश्विन कृष्णपक्ष की अमावस्या तिथि के दिन सर्वपितरों का विसर्जन किया जाता है। तर्पण आदि पिण्डदान करने के लिए सफेद या पीतवर्ण के वस्त्र धारण करने चाहिए। श्राद्धकृत्य से सम्बन्धित कोई भी कार्य रात्रि बेला में नहीं किया जाता है। जो व्यक्ति श्राद्ध करने हेतु सामार्थ न रखता हो, उन्हें मात्र जल में काला तिल लेकर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके अपने पितरों को याद करके तिलांजलि देनी चाहिए। अपने दोनों हाथों को ऊपर करके पितरों से कहना चाहिए कि मेरे पास श्राद्धकृत्य करने का सामथ्र्य नहीं है, मुझे क्षमा करें। अथवा पितृगण को प्रसन्न करने के लिए योग्य ब्राह्मण को एक मुट्ठी काला तिल दान कर देना चाहिए। ज्योतिषविद् विमल जैन ने बताया कि श्राद्धकर्ता को पूर्ण श्रद्धा के साथ श्राद्धकृत्य विधि-विधानपूर्वक कर्मकाण्डी विद्वान ब्राह्मण द्वारा ही उपयुक्त समय पर करवाना लाभकारी रहता है। श्राद्धकर्ता को श्राद्ध के निमित्त बने भोजन को अवश्य ग्रहण करना चाहिए। पितरों के श्राद्ध करने से जीवनभर सुख-शान्ति बनी रहती है।
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