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– बिल्ला अनगिनत पर आग बुझाने का इंतजाम एक भी नहीं
– बिल्लाधारियों को एक्सपर्ट राय : घटना हो जाए तो बिल्ला उतारो और भागो!
भदोही की घटना से सबक की जरूरत
राजनीतिक चुनावों की तरह पूजा, पाठ, इबादत आदि समारोहों की कमान प्रायः शरारत भरे हाथों में चले जाने के कारण कहीं आगज़नी, कहीं मारपीट, कहीं अश्लीलता-फूहड़ता, कहीं मान्य परंपराओं का LAC जैसा उल्लंघन तो कहीं सरकार के राजस्व बढ़ाने के दावों के साथ दारू की बोतलों की बहार आ जाती है। जिस तरह राजनीति के मैदान में पढ़े-लिखे भले लोग सिर्फ व्यवस्था को कोसने में लगे रहते हैं, उसका फायदा उठाकर नौ लाख की हवेली की तीर्थयात्रा कर रहे या करके लौटे राजनीतिक धुरंधर चुनावी मैदानों में धुआंधार बैटिंग करते देखे जाते है, ठीक उसी तरह धार्मिक समारोहों और जलसों में उदण्ड, उत्पाती, उश्रृंखल और लफ़ंगा-दी ग्रेट ज्यादा सक्रिय हो जाते हैं। इन्हें देख बड़े-बड़े हुक्मरान भी यूं ही मुंह नहीं फेर लेते, क्योंकि कुछ के तन-बदन से अवांछित गतिविधियों की दुर्गंध तो आती ही है और इसके अलावा ऐसे लोग बड़े-बड़े राजनीतिक मंचों पर प्रायः सेल्फी लेते और माला पहनते-पहनाते भी दिखाई पड़ते हैं। इन्हें देख धृतराष्ट्र की आंख जन्मजात थी ही नहीं पर जो गांधारी मजबूरी में पट्टी बांधे थी, वही पट्टी कस कर बांध लेने की मजबूरियां कार्यक्रमों और समारोहों को हादसे में बदल देती हैं।
औराई में आग लगाई तो किसने लगाई?
नवरात्र का 7वां दिन रविवार को था। रविवार सूर्यनारायण का दिन होता है लेकिन भदोही जनपद के औराई में रात के वक्त दुर्गापूजा पंडाल में ऐसी आग लगी कि इन पंक्तियों के लिखे जाने तक पांच जानें न जाने किन कारणों से पंच पांडवों के पास चली गईं और 52 जानें 52 शक्तिपीठों की ओर रवाना हो गईं।
आग कैसे लगी?
इसका संक्षिप्त और शॉर्टकट जवाब तो यही है कि बिजली के तारो में धूमधड़ाके से उत्साह आ गया और उसमें दौड़ता करंट भी मचल कर डांस आदि करने लगा। मौका दशमी का है तो इसे डांडिया डांस ही मान लेने में कोई परहेज इसलिए नहीं क्योंकि इस डांस पर अनेक जगहों पर आयोजकों को भी ‘मोहे आए न जग से लाज, इतना जोर से नांचू आज कि मर्यादा की सीमा टूट गए’ की स्थिति में देखा जा चुका है।
वाहनों में तो पेट्रोल नहीं और मुंह में पेट्रोल ?
इन दिनों भौतिक वस्तुओं में सुप्रीमो की हैसियत का पेट्रोल हो गया है। राजनीति के प्रमुख राजधानियों से लेकर जिलों-जिलों के कोने-कोने तक में पेट्रोल को बड़े आदर के साथ ‘श्रीमान् पेट्रोल महाराज’ जैसे संबोधनों से बुलाया जाता है। GST की हैसियत नहीं कि ‘पेट्रोल जी’ को अपने गोल में मिला सके। ऐसी स्थिति में कार्यक्रमों में पेट्रोल को लेकर कलाबाजी देखी जा रही है। मुंह में पेट्रोल भरकर गजेड़ियों जैसे मुंह से फूंक मारी जाती है और आमजनता के दिल की आग उस फूंक में दिखाई पड़ने लगती है। औराई पूजा पंडाल अग्नियज्ञ में भी कुछ इसी तरह के मुंह से पेट्रोल मन्त्रजाप की बातें आ रही हैं, जो जांच का विषय तो है ही।
सच पर नज़र
यहां भी कदम-दर-कदम पंडाल बने हैं। सही गिनती तो पुलिस वाले भी नहीं बता सकते। क्योंकि जिस भी बंदा के मन में चंदा-प्रेम जागा, वह तंबू-कनात तनवा दे रहा है। जिले में सिर्फ कुछ आयोजकों ने बिजली विभाग से कनेक्शन का सहयोग लिया है। भारी समारोहों में अग्निकांड हो जाने पर पर्याप्त बालू होना चाहिए, लेकिन बालू तो बवालू है, इस नाते इससे परहेज कर लिया गया है। आग बुझाने के संयन्त्र की प्रायः आयोजकों को जानकारी ही नहीं रहती तो आग को भाग-भाग कैसे कहा जा सकता है?
अब क्या प्लानिंग है?
साल में एक बार का त्योहार है। लिहाजा मोबाईल की DP में फोटो लगाने के लिए प्राय: सभी आयोजकों ने बड़े-छोटे बिल्ले तो मंगा ही लिए जो उनके सीने पर चढ़कर ललकारते देखे जाते हैं, लेकिन आग लगने पर दर्शकों को कैसे बचाया जाए, इसकी चिंता ही नहीं।
पहले कूद कर भागने की ट्रेनिंग
चूंकि समय कम है। पंडाल सज गए हैं। इस स्थिति में कतिपय आयोजक जूडो-कराटे वालों से ट्रेनिंग लेने में लगे हैं कि यदि कांड कोई हो जाए तो क्या किया जाए? एक्सपर्ट राय थी-‘पहले तो बिल्ला उतार कर फेंको और जहां कहीं जिस पोजीशन में रहो, कूद कर भाग जाओ, मेन रोड नहीं बल्कि गली पकड़ो। मौके पर पकड़ में मत आओ। बाद में ऊपर से टेलीफोन कराकर मौज करो।
-सलिल पांडेय, मिर्जापुर।
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